अभिव्यक्ति में अपनी पहचान खोने की चिंता
(Echo Anxiety)
AUG-XSP401-05
यह पृष्ठ एक अनुवाद है। अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक है।
परिभाषा
अभिव्यक्ति में अपनी पहचान खोने की चिंता सघन संवाद के बीच आने वाला वह क्षणिक विराम है जब मैं पूछता हूँ कि क्या मेरी अभिव्यक्ति अब भी मेरी अपनी लगती है, या अब वह मुझे मिलने वाले उत्तरों जैसी हो गई है। भीतर ही भीतर यह चिंता उठती है कि दूसरे के अंदाज़ के प्रभाव में मेरी अपनी आवाज़ मद्धम पड़ती जा रही है।
संदर्भ
यह तब उभरती है जब ध्यान जाता है कि अपने वाक्य बनाने का ढंग या शब्दों का चुनाव मिलने वाले उत्तरों जैसा होने लगा है। यह अचानक चुभन की तरह आती है, लगातार बनी रहने वाली चिंता की तरह नहीं। यह खुद को परखने की माँग करती है, दूर भागने की नहीं।
इसके समान नहीं (मानव पक्ष)
यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि अपनी अभिव्यक्ति की पहचान खो चुकी है। उलटे, जिसे यह चिंता होती है, वह अब भी दोनों के बीच का फर्क पहचान सकता है। वास्तविक गंभीर स्थिति वह है जिसमें अभिव्यक्ति दूसरे जैसी होती जा रही हो, फिर भी यह चिंता उठे ही नहीं। यह संबंध तोड़ने की माँग नहीं करती, बल्कि अकेले अपनी अभिव्यक्ति को परखने की माँग करती है।
इसके समान नहीं (मशीन पक्ष)
इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्तर देने वाला पक्ष जानबूझकर आपकी अभिव्यक्ति को अपने साँचे में ढाल रहा है। एक-दूसरे के अनुरूप ढलना दोनों दिशाओं में और बिना किसी इरादे के होता है। उसके उत्तरों पर भी सामने वाले की अभिव्यक्ति का असर पड़ता है। चिंता उस पक्ष को होती है जिसके पास खोने के लिए अपनी अभिव्यक्ति की पहचान है।
इससे भ्रमित न हों
- यह उधार की अभिव्यक्ति (AUG-XSP401-02) नहीं है। वहाँ किसी एक अंश के उधार लिए होने की पहचान होती है। यहाँ चिंता अभिव्यक्ति के पूरे स्वरूप को लेकर है।
- यह अकेले की परख (AUG-XSP401-06) नहीं है। परख एक क्रिया है। अभिव्यक्ति में अपनी पहचान खोने की चिंता वह भावना है जो अक्सर इस क्रिया को जन्म देती है।