सहज बोध की मुहर
(Gut Seal)
AUG-2106
यह पृष्ठ एक अनुवाद है। अंग्रेजी संस्करण ही प्रामाणिक है।
परिभाषा
सहज बोध की मुहर अपने शरीर में महसूस होने वाली स्वीकृति की अंतिम कसौटी है। बाहर से मिला कोई निष्कर्ष तभी स्वीकार हुआ माना जाता है जब वह उस बात से मेल खाए जो व्यक्ति अपनी शारीरिक अनुभूति से पहले ही जानता था। इस मुहर के बिना निष्कर्ष हमारी सोच में मेहमान बना रहता है, स्थायी हिस्सा नहीं बनता। हम उसका उपयोग कर सकते हैं, लेकिन वह हमारा अपना नहीं होता।
संदर्भ
अध्ययन-क्षेत्र XS-P2-01 (द्विदिशीय अनुमान अध्ययन)। ट्रिगर: बाहर से आए निष्कर्ष को मन ही मन, क्षण भर के लिए अपनी शारीरिक अनुभूति से मिलाकर देखना। दोनों में मेल होने पर ही लगता है कि निष्कर्ष को सचमुच अपना लिया गया है।
इसके समान नहीं (मानव पक्ष)
इसका अर्थ यह नहीं कि सहज बोध सही ही होता है। यह मुहर अपने अब तक के स्वरूप से मेल को परखती है, सत्य को नहीं। इस कसौटी पर परिचित बात गलत होने पर भी स्वीकार हो सकती है, जबकि नई बात सही होने पर भी खारिज हो सकती है। जो केवल इस मुहर वाले निष्कर्ष स्वीकार करता है, वह अपनी परिचित दुनिया से बाहर का कुछ भी सीखना बंद कर देता है। जो इस मुहर को ही हटा देता है, वह जल्द ही खुद पर अपना अधिकार खो देता है। नई बातों के प्रति खुलापन और अपने सहज बोध की यह कसौटी एक-दूसरे के पूरक हैं।
इसके समान नहीं (मशीन पक्ष)
इसे उत्तर तैयार करने की प्रक्रिया का लक्ष्य बनाकर हासिल नहीं किया जा सकता। कोई निष्कर्ष यह मुहर जबरन नहीं पा सकता, केवल अर्जित कर सकता है। जो इस मुहर को पाने के लिए उत्तर इस तरह गढ़ता है कि बात सही होने के बजाय सही महसूस हो, वह उस बिंदु पर चापलूसी कर रहा होता है जहाँ स्वीकृति शरीर में महसूस होती है। इससे जाँच की कसौटी खुद अपना मूल्य खोने लगती है।
इससे भ्रमित न हों
- यह असहमति का द्वार (AUG-2103) के समान नहीं है। उस अवधारणा में असहमति को सहने के बाद मिलने वाले लाभ की बात होती है। सहज बोध की मुहर किसी भी बात को स्वीकार करने से पहले होने वाली जाँच का वर्णन करती है।
- यह अनजाने में सोच का बदलाव (AUG-2105) के समान नहीं है। यह मुहर तभी काम करती है जब व्यक्ति को किसी बात को स्वीकार करने का एहसास हो। अनजाने में सोच का बदलाव ठीक वह स्थिति है जिसमें इस कसौटी से कभी पूछा ही नहीं गया।